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Hanagal Kumaraswamy & Pt. Panchakshara Gawai
Hanagal Kumaraswamy & Pt. Panchakshara Gawai Pt. Puttaraj Gawai
|| श्री गुरु कुमार वन्दे ||

सुक्षेत्र श्री वीरेश्वर पुण्याश्रम

परमपूज्य, गानयोगी, कवियोगी

पंडित पंचाक्षर गवाई

पद्वभूषण डॉ. पंडित पुट्टराज कवि गवाई

Pt. Puttaraj Gawai

H.H. Hanagal Kumara Shivayogi Mahaswamiji – Pontiff & Spiritual Guide

हानगल गुरु कुमार महास्वामीजी
दिव्य आत्मा

हानगल गुरु कुमार महास्वामीजी

1867 – 1930

शिवयोग मंदिर के संस्थापक और सामाजिक सुधार के युगपुरुष

समाज सुधारक शिवयोगी संस्थापक

त्वरित तथ्य

जन्म तिथि सितंबर 11, 1867
महासमाधि सितंबर 16, 1930
जन्मस्थान जोयिसरा हरलाहल्ली, हावेरी जिला, कर्नाटक
भूमिका / योगदान शिवयोग मंदिर की स्थापना, समाज सुधार, दृष्टिहीन बच्चों की शिक्षा का सूत्रपात
पूर्वाधिकारी हानगल विरक्त मठ परंपरा
उत्तराधिकारी पं. पंचाक्षर गवाई (आध्यात्मिक उत्तराधिकारी)
वाद्ययंत्र वैदिक पाठ, धर्म शास्त्र
प्रमुख रचनाएँ शिवयोग मंदिर नियमावली, शरण वचनों का पुनरुद्धार
पुरस्कार एवं सम्मान युगपुरुष, अभिनव बसवण्णा (श्रद्धालुओं द्वारा प्रदत्त)

आध्यात्मिक और जीवन यात्रा

हानगल गुरु कुमार महास्वामीजी कर्नाटक के सामाजिक-धार्मिक इतिहास में एक महान विभूति हैं। उनका जन्म 11 सितंबर 1867 को हावेरी जिले के हरलाहल्ली में बसवय्या और नीलम्मा के घर हुआ था, और उनका बचपन का नाम हालय्या था। बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव होने के कारण उन्होंने छोटी उम्र में ही सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया। उन्होंने हुबली के सिद्धारूढ़ स्वामीजी के मार्गदर्शन में शिवयोग साधना सीखी।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक योगदान

उनका सबसे ऐतिहासिक योगदान 1909 में बादामी के पास प्रसिद्ध "शिवयोग मंदिर" की स्थापना है। यह संस्थान संन्यासियों और विद्वानों के प्रशिक्षण के लिए एक आध्यात्मिक केंद्र बन गया। दृष्टिहीन बच्चों के लिए संगीत को एक दिव्य मार्ग मानते हुए, स्वामीजी ने उन्हें संरक्षण देना शुरू किया। इसी नींव पर उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी पं. पंचाक्षर गवाई ने बाद में वीरेश्वर पुण्याश्रम की स्थापना की।

दिव्य विरासत और सीख

स्वामीजी एक सच्चे देशभक्त भी थे। महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन के समर्थक के रूप में उन्होंने अपने शिष्यों को खादी पहनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपना जीवन शरण वचनों के संरक्षण और गुरु बसवेश्वर के सिद्धांतों के प्रचार में समर्पित कर दिया। स्वामीजी ने 16 सितंबर 1930 को महासमाधि प्राप्त की। शिवयोग मंदिर में स्थित उनका समाधि स्थल आज भी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा स्रोत है।

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